Saturday, March 7, 2020

पांडव-नृत्य... कुछ अनछुए कहानियां

   
    महाभारत के युद्ध के पश्चात पांडवों और कौरवो  के एक ही कुल के होने की वजह से पांडवो पर कुल हत्या ,गौत्र हत्या , व् ब्रह्म हत्या का पाप लगा. अतः इस पाप के पस्चताप के लिए वे वेद व्यास मुनि जी के पास गए  जिन्होंने आदेश दिया कि भगवान् शिव के शरण में जाकर ही पांडवो को इन पापो से मुक्ति मिलेगी। अतः वे शिव की तलाश में काशी चले गए। परन्तु भगवान् शिव उन्हें मुक्ति नहीं देना चाहते थे इसलिए वे पांडवो से छिपकर केदार खंड में जा कर छिप गए। पांडव गुप्तकाशी होते हुए गौरीकुंड पहुंच गए ,जहा पर एक ग्वाला कुछ पशुओं  को चारा रहा था। पांडव समझ गए की भगवान शिव एक भैसे के भेष में वहा  पर हैं। भीम ने तुरंत ही नकुल और सहदेव को  कहा की उन पशुओ को वो अपने पाओं  के बीच से गुजारे और जो भगवान् शिव होंगे वो नहीं गुजरेंगे। भीम की चाल को भांपते ही भगवन शिव धरती में ही समाने लगे। धरती में समाते ही उनकी पूछ को भीम ने पकड़ लिया जिसकी वजह से भगवान् शिव जी के सर पशुपतिनाथ नेपाल में प्रकट हुए ,नाभि और पेट मद्महेश्वर में ,भुजाएं तुंगनाथ में ,पृष्ठ भाग केदारनाथ में ,जटा  कल्पनाथ में एवं मुख रुद्रनाथ में प्रकट हुए। माना जाता है की इन्हीं  स्थानों पर पांडवो ने भगवान् शिव के मंदिरो का निर्माण किया जिन्हे आज पंचकेदार के नाम से जाना जाता है। 
    अतः भगवान् शिव से माफ़ी मांगने के पश्चात वे मोक्ष प्राप्ति के लिए बैकुंठ धाम से होते हुए स्वर्गारोहिणी को चले गए।
        
        
       महाभारत के विनाशकारी युद्ध के पश्चात पांडवो ने अपने अश्त्र-शत्रो को त्याग दिया अतः स्वर्गारोहिणी के दौरान वे जहाँ -जहाँ  से गुजरे वहां के स्थानीय लोगो को अपने सारे अश्त्र-शस्त्र सौंप  दिए और उन पर अपने अलौकिक प्रभाव का छाप छोड़ गए जिसके फलस्वरूप पांडव स्थानीय निवासियों पर अवतरित होने लगे   गढ़वाल के लोगो ने पांडवो के इन अवतारों को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया।  अतएव  गढ़वाल के विभिन्न जगहों पर स्थानीय लोगो द्वारा पांडव - नृत्य या पांडव लीला का  बड़े भव्य तरीके से जाता है।पांडव नृत्य में महाभारत काल से जुडी विभिन्न घटनाओं जैसे महाभारत के युद्ध,अज्ञातवास एवं युद्ध के पश्चात की स्थिति को दर्शाया  जाता है। 

         यह नृत्य नवम्बर एवं दिसंबर माह के आस-पास मनाया जाता है। गॉव वालो द्वारा एक पंचायत की बैठक बुलाई जाती है जिसमें पांडव नृत्य की तिथी एवं रूपरेखा तैयार की जाती है। इसके पश्चात निर्धारित तिथि पर गांव के सभी लोग पाण्डव चौक पर इकट्ठे होते हैं। और इसके पश्चात विभिन्न आयोजनों जैसे बाण निकलने कितिथि का आयोजन ,धार्मिक स्नान ,मोरु डाली ,माल्लाफुलारी ,विभिन्न व्यूह की रचना , गैंडो कौथिग  अदि का आयोजन किया जाता है। यहाँ पर दास को भी बुलाय जाता है जो गढ़वाल के पारम्परिक वाद्य यन्त्र ढोल व् दमाऊ जिनमें की अलौकिक शक्तियोँ का समावेश  रहता को विभिन्न थापों के द्वारा पांडवो को अवतरित करते हैं ।  

एक विशेष थाप पर एक विशेष पांडव ही अवतार लेते है और जिन व्यक्ति में वे अवतार लेते हैं उन्हें पश्वा कहा जाता है। इस तरह इसमें कुल 13 पश्वा अवतार लेते हैं जिनमें अर्जुन,भीम,नकुल,सहदेव,द्रौपदी,कृष्णा,युधिष्ठिर ,हनुमान,मालाफुलारी,कल्यावर ,बरबरीक आदि।




        
        पण्डवनृत्य की तयारी के लिए पंचायत द्वारा गांव के चयनित लोगो का हर कार्य जैसे पांडव चौक पर आग जलने के लिए लकड़ी इक्कठे करना ,विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ उपलब्ध करना ,अश्त्र -शास्त्रों को सजाना ,पांडवो के लिए कपड़े तैयार करना एवं चौक की साफ़ सफाई का प्रबंद करना आदि निर्धारित होता है। इसमें गाँव के अन्य लोग भी स्वेच्छा से अपना भी योगदान देते हैं क्यों की स्थानीय ननिवासियों का मानना है कि इससे गांव में व् उनके परिवार में पांडवो द्वारा खुशहाली व् समृद्धि का वरदान प्राप्त होता है।
  
        इस तरह से मंत्रो उच्चारणों  व गढ़वाल के वाद्य यंत्रो ढोल -दामों  द्वारा पांडवो को प्रकट किया जाता है।   द्रोणाचार्य या नागार्जुन की माता वसुधंता  द्वारा  पांडव नृत्य में अवतरित हुए देवो को उनके अश्त्र -शस्त्र प्रदान किये जातें हैं। हरएक प्रतिभागी एक विशेष अश्त्र - शस्त्र के साथ नृत्य करते हैं।


साथ ही इस नृत्य में विभिन्न प्रकार के कौथिग और लीलाओं को एक विशेष नृत्य एवं ढोल के थाप के द्वारा दर्शाया जाता है। इस नृत्य से जुडी पौराणिक काल की विभिन्न अनकही कहानियां प्रचलित हैं जो महाभारत एवं पांडव नृत्य के सभी किरदारों को एक रूप में पिरोते हुए एक दुसरे से जोड़ती हैं। 


कलयुम कौथिग


इस लीला में भीम अपने गदा द्वारा  पौराणिक  धार्मिक अनुष्टठान के साथ एक देवदार के पैड़  को बिना खंडित किये जड़ सहित उखाड़ दिया जाता है और उसे चौक पर जहां पांडव नृत्य का आयोजन किया जाता है वहाँ पर पूरे गर्व व् सम्मान के साथ देवदार के पैड़ को खड़ा किया जाता है। 


पेड को खंडित कर यानि की काट कर  उखाड़ना उसका अपमान मन जाता है। इस देवदार के पैड़ को उखाड़ने के लीला की भी एक कहानी है जो महाभारत काल के पण्डवों के अज्ञातवास से जुड़ा हुआ है। जब पांडव अज्ञातवास को निकले तो कौरवो ने उन्हें अपने अश्त्र शस्त्र त्यागकर अज्ञातवास जाने की शर्त रखी जिसके फलस्वरूप उन्होंने अपने अश्त्र शस्त्र को कृष्ण के द्वारका नगरी में छिपाने की कोशिस की परन्तु वहां पर कोई भी इन अस्त्र-शस्त्रों को रखने को तैयार नहीं हुआ। तब उन्हें एक देवदार का पैड़ जो की एक शमशान के जमीन पर उगा हुआ था, ने उनकी मदत की। देवदार के पैड़ ने पांडवो के सारे अश्त्र और शश्त्रो को अपने गर्भ में छिपा लिया और यह शर्त रखी की वो उनके अश्त्र - शश्त्र की रक्षा करेगी परन्तु भविस्य में पांडवो को भी उस देवदार के पैड़ की रक्षा करनी पड़ेगी। इसके पश्चात पांडव अज्ञातवास के लिए निकल पड़े और कुछ वर्ष पश्चात पांडवो ने अपने अश्त्र - शस्त्रो को देवदार के पैड़ से वापिस लिए और महाभारत के युद्ध में  विजयी हुए।
पांडव चौक पर पांडवो द्व्रारा लाये गए देवदार के पैड़ को  ख़ुशी के साथ पांडव चौक पर इस्थापित कर गॉव वाले देवदार एवं पांडवो के बीच हुए वादे की रस्म को दर्शाते हैं। और इस तरह से देवदार के पैड़ पूरे गढ़वाल में लम्बे समय से विजय का प्रतीक है बना हुआ है।



गैंडे का वध


इस खेल को दर्षाने के लिए एक गैंडे का पुतला बनाया जाता है जिसमें चार छोटे बॉंस के डंडो को कद्दू में डाल कर उसके पैर बनाये जाते हैं।साथ हीं में उसके मुँह नाक कान और मूछे भी बनायीं जाती है।फिर अर्जुन गैंडे का वध करता है। और उसके पश्चात अर्जुन एवं उनके पुत्र नागार्जुना के बीच युद्ध होता है। ये सभी एक नृत्य  के साथ दर्शाया जाता है।गैंडे के पुतले को एक औरत पंखा द्वारा हवा करते हुए दिखाया जाता है जो या तो नागार्जुन की माता के रूप में होती है। इसमें एक भागदत्त नाम का विदूषक भी होता है जो की धरती माता के पौत्र के रूप जाना जाता है। वह विभिन्न प्रकार की ठिठोलियाँ करता रहता है। परन्तु नागलोक जाने का रास्ता सिर्फ उसी को ही पता होता है जिसे जाने के लिए पांडव उसे सोने का कुछ उपहार घूस के रूप में देते हैं। तब अर्जुन और नागार्जुन के युद्ध के दौरान भागदत्त वहां से भाग जाता है। 



     उसके बाद द्वापर युग में एक दिन नारद मुनि जी ने जंगल  में राजा पाण्डु को देखा जबकि राजा पाण्डु की मृत्यु हो चुकी थी। राजा पाण्डु  मृत्यु के पश्चात स्वर्गलोक नहीं गए और उनकी आत्मा मृत्यु लोक में ही भटक रही थी। यह बात उन्होंने ने राजा युधिष्ठिर को जा के कही और बताया की युधिष्ठिर को इन्द्रियाना बलि श्राद्ध करना होगा जिसके लिए युधिष्ठिर को हाथी के पाँव के छाप के नीचे की मिट्टी ,मलारी की मिट्टी ,जौरास की जौ ,तिल के बाग़ से तिल ,तिब्बत से सोना,और गैंडे का सींग जैसे कुछ वस्तुओ को इक्कट्ठा करना होगा ।
     अब क्यू की अर्जुन उससमय नागलोक में था जहां पर अर्जुन का विवाह शिवजी के वरदान से वसुदंता जो की नागलोक के राजा वासुकि की पुत्री थी ,के साथ हो रहा था। इसलिए माता कुंती ने एक भौरे के पंख के नीचे एक सन्देश भेजा जिसमें अर्जुन को शीग्र अति शीग्र वापिस हस्तिनापुर आने के लिए बोला गया जिसे की पाण्डु के श्राद्ध की प्रक्रिया  की जाये क्यू की उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति नहीं हुई  है।हस्तिनापुर लौटते वक्त अर्जुन ने   वसुदंता को एक अंगूठी  भैंट की जो की उनके विवाह की निशानी के रूप में थी। उस अंगूठी के वजह से अर्जुन पल भर में ही कितनी भी लम्बी दूरी की यात्रा क्यू न  हो ,तय कर लेते। परन्तु इस बार उनको हस्तिनापुर पहुंचने में 12 वर्ष लगे। नागलोक छोड़ते वक्त वसुदंता का एक पुत्र नागार्जुना हुआ जिसको अब बारह वर्ष हो चुके थे। 12 वर्ष पश्च्चात अर्जुन हस्तिनापुर पहुंचे जहा उन्हे पता चल की उनके पिता पाण्डु के श्राद्ध प्रक्रिया के लिए एक गैंडे के सींग की जरूरत है जिसे अर्जुन को इंद्रलोक से लाना होगा। उसी वक्त जब नागार्जुना ने  अपने पिता के बारे में पुछा तो वसुदंता ने उस अंगूठी को दिखाया जिसमें उसके पिता और दादा का नाम लिखा हुआ था। नागार्जुना के दादा इंद्रा देव थे जो अमरवती में  थे  और जो हस्तिनापुर से नजदीक था। नागार्जुन अमरवती गया और इंद्र को बताया  की वो अर्जुन का पुत्र है और इंद्र उसके दादाजी। तब इंद्र ने नागार्जुन के परीक्षा ली ताकि पता चल सके की हकीकत में वह अर्जुन का पुत्र है। इंद्रा ने कहा की जाओ और गैंडे को पानी पिला के यहाँ लाओ जो की किसी के लिए भी असम्भव   था। नागार्जुन उस गैंडे के पास गया उसे सहलाया ,उसे बन्धन मुक्त किया और पानी पीला के इंद्रा के दरबार में ले आया जिससे इंद्रा को एहसास हो गया की नागार्जुन असली में अर्जुन का ही पुत्र है और गैंडे को अपने साथ ले जाने का आदेश दिया।
    कुछ समय पश्चात गेंडे की तलाश में अर्जुन अपने पिता इंद्रा के पास आया  जहां उसे पता चला की उसके ही पुत्र ने उस गेंडे को अपने साथ नागलोक ले गया है जिस पर उसे विश्वास न हुआ क्यू की उसे नहीं पता था की उसका एक पुत्र भी है जो नागलोक का निवासी है। अर्जुन वापिस हस्तिनापुर आ  कर माता कुंती से आशीर्वाद ले कर धरती माता के पौत्र भागदत्त के साथ नागलोक के लिए चल पड़ा। रस्ते पर एक चौराहा पड़ा। उस चौराहे पर जहां सिर्फ सीढ़ियां ही सीढ़ियां थी जो स्वर्गलोक की तरफ जाती थी।  जहां  हाथी के पॉव के निशाँन थे वो इंद्र के निवास स्थान अमरावत की तरफ जाती थी। और जहां बैल के खुर के निशाँन थे वो गंदमाधन पर्वत यानि कैलाश पर्वत की और जाता था जो की भगवान् शिव का निवास स्थान है। और जहां गाय के खाद पड़े थे वो रास्ता हरे जांगले की तरफ जाता था। जहां पर सिर्फ एक ही पद चाप पड़े थे वो मोनोपेड राज्य की तरफ जाता  था। और वो रास्ता जिस पर एक छड़ के रगड़ने का निशाँन  बना पड़ा था  वो नागलोक की तरफ जाता था जिस रास्ते को अर्जुन ने अपनाया। अर्जुन उस रास्ते से धर्मशिला पंहुचा और वह पर स्थित तालुका तालाब के पास एक पेड़ के ऊपर अपना डेरा जमाया। जब भी गेंडे को प्यास लगती नागार्जुन उसे लेकर तालुका तालाब के पास आता जहां पर गैंडा सबसे पहले पानी की कुछ बूंदे सवर्गलोक की तरफ छिड़कता उसके बाद कुछ पातळ लोक की तरफ और फिर स्वयं पीता। अर्जुन उस समय उस पेड़ पर सो रहा था की तभी उस पर पानी की कुछ बूंदे गिरी जिससे वह जाग गया और गैंडे को पानी पीते देखते ही उसे अपने तीव्र बाणों से उसे मार डाला।तभी  वह गैंडा आगे बड़ा और उसकी कराह से धरती भी काँप गई जिसके आभास से नागार्जुन शीघ्र ही तालुका तालाब के पास पहुँचा  और अर्जुन को देखते ही उसके साथ   युद्ध करने लगा। दोनों के पास वही बाण थे जो  भगवान् शिवजी ने अर्जुन और वसुंधता को दिए थे। इसलिए दोनों द्वारा चलाये गए बाण उन दोनों को ही स्पर्श नहीं करा रहे थे। तब नागार्जुन ने कलियाँ नाम के लुहार से निगुर बाण(जो किसी भी  आज्ञा नहीं मंटा हो ) बनवाये  जो किसी से भी पक्षपात नहीं करता था। नागार्जुना ने वह प्राणघातक बाण से   अर्जुन पर वार किया जिसे अर्जुन मृत्य हो कर गिर पड़े।



फिर नागार्जुन ने अर्जुन के गांधव को बाणों के साथ अपनी माता के पास ले गया जिसे देखते ही उसकी माता ने उसे बताया की जिसपर  उसने अपनों प्राणघातक बाणों से प्रहार कर मार दिया है वो उसके पिताजी थे।  तभी माता कुंती और भवान श्रीकृष्ण वहां पर पहुंचे और भगवान् श्री कृष्णा जी ने अर्जुन को पुनर्जीवित कर दिया।
पुनर्जीवीत होते ही नागार्जुना अर्जुन के पैरो पर गिर पड़े और उनसे क्षमा मांगी। उसके पश्चात दोनों  पिता पुत्र ख़ुशी ख़ुशी गैंडे का सींग ले कर  पाण्डु के अंतिम क्रिया करने हस्तिनापुर चले गए।




 कहा जाता है की देवदार का पैड़ ,भीष्मपितामह ,पांडव एवं गैंडा जिन्हे गैंडा कौथिग में दर्शाया जाता  है ,एक ही वंशज के हैं।इनके एक ही वंशज होने की कहानी इस प्रकार से है ..... 



1.   आत्मदेव जो की बहुत बूढ़े हो चुके थे उनकी एक गाय थी जिसका नाम था कैयला। कैयला ने एक बछड़े को जन्म दिया। उस समय आत्मदेव ने कुछ घास लेके अपने गाय को खिलने के लिए उसके  पास गए।उस समय गाय का बछड़ा दूध पी रहा था। जिसे ही आत्मदेव ने गाय के बछड़े को दूध दोहने के लिए हटाया तो बछड़े ने उछाल कर अपने खुर से आत्मदेव के सर पर दे मारा  जिससे आत्मदेव की मौके पर हो मृत्यु हो गयी और उस बछड़े को ब्रह्म हत्या  का पाप लग गया। तब कैयला गाय ने उस बछड़े को दूध देने से मन कर दिया। तब आत्मदेव के गाय ने खिम्मी-करनी तालाब में अपने बछड़े के लिए तब तक दूध बचा के रखा जब तक वह ब्रह्म हत्या से मुक्त नहीं हो जाता।
कहा जाता है की पहले ब्रह्मा जी के पांच सिर थे उसमें से पांचवा सिर बहुत भद्दे शब्दों का इस्तेमाल करता  था  तो भगवान् शिवजी ने उनका पांचवा सिर काट दिया जिस वजह से उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लग गया। इस ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने के लिए  उन्होंने वाराणसी के गोमती नदी में डुबकी लगायी और भगवान् शिव ब्रह्महत्या से मुक्त हुए।
इसीलिए आत्मदेव के गाय के बछड़े ने भी गोमती नदी में डुबकी लगायी और ब्रह्म हत्या से मुक्त हो गया और उसके पश्चात एक सर्प के रूप में दुबारा जन्म लिया। हज़ारो साल जीने के पश्चात एक दिन एक गरुड़ द्वारा वह मारा गया और उस गरुड़ ने उस सर्प को खिम्मी-करनी तालाब में फेंक दिया और उसी तालाब में उस मरे हुए सर्प की हड्डियों से देवदार के पैड़ का जन्म हुआ।


2.   आत्मदेव जो की विद्याधरा  के पिता थे एक ब्राह्मण कुल के थे। आत्मदेव के दो पुत्र थे अनुज  पुत्र जिसका         नाम विद्याधरा और धार्मिस्टिया जो की ज्येष्ठ पुत्र था।  आत्मदेव के बड़े पुत्र धरमिष्टय काशी में अपनी संस्कृत की शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात घर वापिस लौटने लगे । उनके गुरूजी ने कहा अगर उसने संस्कृत की शिक्षा अच्छी तरह से पूर्ण  कर लिया है तो अबसे उसके पाँव  से एक भी जीव की मृत्यु नहीं होनी चाहिए। जब धरमिष्टय घर को लौट रहे थे तो उन्होंने अपना पैर एक पत्थर के ऊपर रखा जिसके नीचे नौ चीटियां थी। वे सभी चीटियां मर गयी और जिसकी वजह से धरमिष्टय को श्राप मिला कि उनके भी नौं बच्चों की मृत्यु हो जायेगी। घर लौटने पर धरमिष्टय की शादी शांता राजेश्वरी नमक ब्रह्मिन लड़की जो गर्ग मुनि की पुत्री थी ,से हुआ।  उनके आठो पुत्रो की मृत्यु के पश्चात नरजी ने धरमिष्टय के नौवें पुत्र को बचाने की कोशिश की परन्तु वह इस बार गर्भ में ही मर गया। जिस वजह से क्रोधित हो कर धरमिष्टय ने नरजी के पेट में ब्रह्मसूल से वार किया। नरजी इस वार से तड़प उठे तो वे विष्णु जी के शरण में गए। तब भगवान् विष्णुजी ने उपाय बताया की सात समुन्दर पार एक पीपल का वृक्ष है जिसके नीचे धरमिष्टय के नौं पुत्र बैठे हुए हैं  उन्हें वापिस लाकर धरमिष्टय को दे दो। जैसे ही धरमिष्टय को नरजी ने उनके नौं पुत्र जीवित वापिस कर दिए तो धरमिष्टय ने नरजी को नौं बार पुनर जीवित होने का वरदान दिया। तब  नरजी द्वापर युग में अर्जुन के रूप में जन्म लिया और उनकी जितनी बार मृत्यु हुए उतनी बार  वो जीवित हो उठे।
  

3.  धरमिष्टय अपने  9 पुत्र और पत्नी के साथ सुखी से स्वर्ग में रह रहे थे ।लेकिन  गुरु वशिष्ट के  गाय चुराने के कारण उनके 8 पुत्रो को धरती पर पुनर्जन्म लेने का श्राप मिला। नवे पुत्र का राजा शांतनु के रूप में जन्म लिया जो आगे चलकर भीष्मपितामह कहलाये जो की पांडवो के पितामह थे. 

4. राजा अग्निधार का पुत्र बहुत बीमार था तो राजा ने उनके ब्राह्मण पुजारी आत्मदेव को बुलावा भेजा। क्यू की आत्मदेवा काफी वृद्ध हो चुके थे और उसने अपने छोटे बेटे को संस्कृत पड़ने के लिए कशी भेजा था इसलिए उसने अपने बड़े बेटे विद्याधरा को राजा के यहाँ भेजा और चेताया की  सिर्फ लाल रंग के वस्त्र को छोड़ कर राजा से सभी तरह के उपहार ले लेना । राजा ने सोने की दरांती ,सोने की छड़ विद्याधरा को भैंट में दिया ताकि वह  लाल वस्त्र साथ ले लें जिससे राजा की सारी अनिस्ट ऊर्जा उस लाल रंग के कपडे के साथ विद्याधरा के साथ चली जाए। परन्तु भगवान् विद्याधरा पर रुष्ट हो गए और एक गाय का वैश धर कर वो विद्याधरा के रास्ते में खड़े हो गए। विद्याधरा ने उस गाय पर पत्थर फेंके और फिर दरांती से वार लिया जिससे उस गाय की मृत्यु हो गयी। मरते वक्त गे ने विद्याधरा को श्राप दिया की तुम अब राक्षस कुल में जन्म लोगे क्यू की तुमने ब्राह्मण कुल के होते हुए भी एक  गाय का वध किया है।
कुछ सालो बाद विद्याधरा ने केशी नाम के राक्षस के घर में जन्म लिया और उसका नाम सूर्या रखा गया।
एक दिन केशी और उसकी पत्नी मास मदिरा के लिए जांगले मैं गए। वो रात भर जांगले में ही रुके जबकि उनका पुत्र सूर्या घर पर अकेला ही था और भूख की वजह से रो रहा था। उसी समय अत्रि मुनि एवं अनसूया देवी आकाश मार्ग से किसी विमान से गुजर रहे थे। वो वहाँ रुके और सूर्या को दूध पिलाकर उसके भूख को शांत किया। दो दिन बाद जब सूर्या के माता -पिता वापिस  आये और अपने पुत्र को कुछ खाने के लिए दिया तो उसने खाने से मना कर दिया और और भूख न लगने की वजह उसने बता दी। फिर उसके माता पिता ने उन दोनों को ढूढ़ने के लिए कहा जिसने भूख के समय राक्षस सूर्या की मदद की।
तब सूर्या ने बहुत  संघर्ष से घसीट -घसीट कर वह पहाड़ो में बेस अत्रि मुनि एवं अनसूया आश्रम में जा पहुंचा। वहाँ पहुंचने पर अत्रि मुनि जी ने उसे कुछ मात्रा सिखाये और उसका नाम देवासुर  रखा दिया। मंत्र सीखने के पश्चात देवसुर को अपने पिछले जन्म की साड़ी बातें याद आ गयीं और उन सभी यादों को उसने अत्रि मुनि जी को बताई। इसके सुनने के पश्चात अत्रि मुनि जी ने   भारत के  360  नदियाँ  में जा कर स्नान करने का आदेश दिया। देवासुर ने उनकी आज्ञा का पालन करते हुए वापिस आया और उसने अत्रि मुनि जी से अपने राक्षसी शरीर से मुक्ति देने को कहा। उस पर अत्रि मुनि जी ने कहा की  जाओ और ऐसी तीर्थ स्थान को ढूढो जहां पर गंगा नदी के किनारे पर एक बहुत विशाल  पत्थर पड़ा हो ,वहीं  पर तुम्हारी मुक्ति होगी। आख़िरकार ढूढ़ते -ढूढ़ते देवासुर को वह पत्थर निल ही गया जो गया में गोमती नदी के तट पर था। देवासुर ने वहां पर सभी देवताओ का आह्वान किया और देवताओं  ने  एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदा और देवासुर को उस गड्ढे में डाल कर उसके ऊपर उस विशाल पत्थर को रख  कर उसका बलिदान दिया। उसके बलिदान के पश्चात उसके बचे हुए हड्डियों से उसका एक पुतला बनाया गया। तब भगवान् विष्णुजी ने द्वारूका को आदेश दिया की बाजार जाओ और रास्ते में जो भी वास्तु पहले मिले उसे ले आओ। तब द्वारूका को गुड़  मिलता है जिसे वो ले आता है और उस गुड़ को शहद के साथ मिलाकर उस पुतले का मांस बनाया जाता है और और कुछ मंत्रो से उसमें प्राण दाल दिए जाते है। उसके पश्चात उस पुतले के आँखों में बलिदान में मिले राख को उसके आँखों में डाल दिया गया। और फिर  पुतला तब तक बड़ा होता गया जब तक की उसके सींग निकल नहीं आते। क्यू की वह भाद्रपद माह  में  गया में जन्म लिया इसलिए उसका नाम गयासुर रखा गया और उसके सींग के वजह से उसे गेंडा  दैत्य कहा गया। इसके पश्चात गयासुर ने तपस्या करके एक वरदान प्राप्त किया की जिन लोगो ने भी उसको छुआ है वो सभी स्वर्गलोक चले जाएँ। इससे यमलोक खाली होने लगा। तब  सभी देवता विष्णुजी के पास गए जिन्होंने ब्रह्माजी को गयासुर के शरीर के ऊपर यज्ञ करने का आदेश दिया। गयासुर ने उठने का प्रयास किया परन्तु देवताओ ने उसे रोक लिया। यम ने एक विशाल पत्थर उसके ऊपर रख दिया जिससे वह ऊपर न उठ सके तब गयासुर ने कहा की अगर उस पत्थर  के ऊपर भगवान् विष्णु और दूसरे देवता गण विराजमान रहेंगे तो वो दुबारा नहीं उठ पायेगा। परन्तु जब देवताओ ने उसे देखा तो वो  डर की वजह से घबरा गए और उन्होंने ने गयासुर को इंद्र को सौँप दिया। तब भगवान् इंद्र ने एक ताम्बे का तम्बूनुमा घर बनाया जिसके अंदर गयासुर को रखा गया। उसके लिए उसके खाने पीने का सामान भी किसी छड़ की मदत से उस तम्बू के अंदर ही दे दिया जाता।
  
   इस तरह से आत्मदेव के गाय के बछड़े ने पहले सर्प योनि उसके पश्चात देवदार के पेड़ के रूप में जन्म लिया और फिर आत्मदेव के  पोते भीष्मपितामह हुए। आत्मदेव के दूसरे अनुज पुत्र जिसने सोने के दरांती से गाय का वध कर दिया था ,ने गेंडा के रूप में जन्म लिया। 



इसीसलिए पांडव नृत्य में देवदार के वृक्ष ,गेंडा एवं पांडव एकसाथ पूजे जाते हैं क्यों की ये सभी एक ही वंसज के थे।



 यह विडिओ ग्राम मेरग  (जोशीमठ ) उत्तराखंड का है जिसमें पांडव नृत्य के कुछ अंशो को दर्शाया  गया है। 

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