Monday, March 25, 2019

26 मार्च आज का दिन.....क्या आपको याद है?------------- गौरा देवी( चिपको आंदोलन की जननी)



आदिकाल से ही वनो का आर्थिक  एवं सामाजिक  महत्व रहा है। भारतीय धर्मग्रंथो में ,वेद-पुराणों में , पर्वत-मालाओं ,सरिताओं , हरे-भरे वृक्षों  एवं विशाल कुदरती वनों का जयगान किया  है। उपनिषद के सृजन  भी वृक्षों की शीतल छाँव में किया गया है।  विशाल वन स्थलों में गीता , रामायण जैसे विश्व की महँ ग्रंथो की रचना हुई। ऋषिमुनियों की तपो भूमि भी वनों में रही ,  भारतीय इतिहास की अनेक घटनाएं हुई।  भगवान् बुद्ध को बोध वृक्ष के नीचे ही ज्ञान प्राप्त हुआ था। पुराणों में वृक्षों  देवताओं का निवास मानकर उनकी वंदना की गई  है।


                                           मूले ब्रह्म्मा , त्वचा विष्णु , सखायाम महेश्वरम। 
                                                 पत्राम सर्वदेवानाम वृक्षदेव नमोस्तुते।।


प्रकति ने वनो के रूप में भारत को एक बहुमूल्य उपहार प्रदान किया है। पारिस्थितिक संतुलन बनाएं रखने में भी वन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह वन ,वन्य जीवों एवं पक्षियों के आवास स्थल के रूप में उपयोगी हैं। इन्ही वनों के कारण ही हमारी यह पृथ्वी अन्य ग्रहों से विशिष्ट एवं जीवनदाता के रूप में है। वृक्षों में वह सभी शक्तियां समाहित हैं ,लेकिन मनुष्य अपनी उन्नति के लिए वृक्षों को काटकर प्रकति का दोहन कर रहा है। परन्तु कुछ ऐसे महामानव भी हुए हैं जिन्हों ने वृक्षों के हित के लिए कार्य किया. वनो के विनाश के विरुद्ध आवाज़ उठाने में महिलाएं आगी रहीं। 
                 17 से 15 मार्च 1974 में सीमान्त निति घाटी की महिलाओं ने गौरा देवी के नेतृत्व में रीणी गाँव में यह सिद्ध कर दिया की जन आंदोलन से वनो की किस प्रकार रक्षा की जा सकती है।चिपको आंदोलन एक ऐसे ही जन आंदोलन के रूप में विश्वविख्यात है जिसका श्रीगणेश सर्वप्रथम एक हिमालय पुत्री "गौरा देवी " ने किया।
            गौरा देवी का जन्म सन् 1925 में निती पास राष्ट्रीय राजमार्ग के जोशीमठ से 25 किमी की दूरी पर बसे गांव "लाता " के एक  परिवार में हुआ था। हिमालय पुत्री गौरा देवी को बचपन से ही प्रकृति के सौंदर्य एवं वन सम्पदा से अगाध प्रेम था। इस क्षेत्र की नारियों एवं किशोरियों के दैनिक जीवन में वनो एवं बुग्यालों से घनिस्ट सम्बन्ध रहा है। गौरा बचपन से देवदार,सुरई ,कैल ,बांज ,बुरांस के छाया के तले बैठ कर अपनी थकान दूर करती थी। और घास काटने जाती थी। इनके दैनिक जीवन में नित्य कर्मो का परोक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से इनके बाल मन पर प्रभाव पड़ा। 
           सन 1936  में 11  वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह नजदीक के गांव  रिणी के निवासी मेहरवान सिंह से हुआ। अब गौरा बहू  बनकर रिणी  आ गयी। अब भी यह अपनी सहेलियों एवं  ताई,चाची के साथ प्रकति के स्वछन्द वातावरण का आनंद लेती थी।  22  वर्ष की उम्र में वह विधवा हो गयी ,तब उनका एक पुत्र था। दुःख तो उन्होंने किसी तरह सह लिया और अन्य हिमालयवासियों की तरह कठोर पिरश्रम  करके अपना जीवन यापन करने लगी।  
            सन  1965  में जोशीमठ और मलारी के बीच भयंकर भूस्खलन और वन विनाश को उन्होए देखा था।  अपने हरे-भरे खेतों ,निकटवर्ती जंगलो को बार-बार रोखड़ होते देखा था। नवम्बर 1972 में गौरा देवी महिला मंगलदल  की अध्यक्ष बनी और उसके बाद गोविन्द सींग रावत , चंडी प्रसाद भट्ट ,कुंदन सिंह ,वासवानन्द नौटियाल , हयात सींग , तथा कई छात्र उस क्षेत्र में आये। आस-पास के गाओं तथा रीणी  में सभाएं हुए।  जनवरी 1974  को रीणी  में चंडी प्रसाद भट्ट ठेकेदार को कहकर आये की उन्हें आंदोलन का सामना करना पड़ेगा। 15 तथा 24  मार्च को जोशीमठ में तथा 25  मार्च को गोपेश्वर में रीणी के जंगल  के कटान के विरूद्ध प्रदर्शन होने के वावजूत मजदूर रीणी पहुंच गए। 
          प्रशासन ने 1962  के युद्धकाल में ली गयी भूमि का मुआवजा एवं सड़क बनने से हुए खेती की क्षति का मुआवजा देने और वन कटान का एक ही दिन 26  मार्च की तिथि को तय किया जिससे की रीणी  के पुरुष मुआवजा लेने कुछ दिन के लिए चमोली चले जाएँ,वहाँ गाँव में कोई भी  पुरुष नहीं रहे तथा उस दिन साइमंड कंपनी के मजदूर रीणी के जंगल साफ़ करके मैदान में तब्दील कर सकें। सीमान्त के गाओं मलारी,द्रोणागिरी,लाता,रीणी पैंग के लोगो को भी मुआवजा लेने चमोली आना पड़ा। हयात सिंह  कटान हेतु मजदूरों के रीणी  पहुंचने की सूचना देने के लिए गोपेश्वर गए। चंडी प्रसाद भट्ट वन अधिकारियों के पूर्व नियोजित कार्यक्रमानुसार गोपेश्वर में फँस गए। गोविन्द सींग रावत (कामरेड) अकेले पड़ गए। किसी को आशा न थी की जंगल बच पाएगा।
                   


               26 मार्च की सुबह श्रमिक जोशीमठ से बस द्वारा तथा वन विभाग के कर्मचारी जीप द्वारा रीणी  की और चले।  रीणी  से पहले ही सब उतर गए और ऋषि गंगा के किनारे-किनारे देवदार के जांगले की और बढ़े। एक लड़की ने हलचल देखी तो वह महिला मंगल दाल की अध्यक्षा गौरा देवी के पास पहुंची।  पारिवारिक संकट झेलने वाली गौरा देवी पर आज एक सामुदायिक उत्तरदायित्व निर्वाह का बोझ आ पड़ा था।  घर के कार्यो में व्यस्त 26 महिलाएं तथा कुछ बच्चे देखते-देखते जांगले की और चल पड़े।  





           इनमें सबसे आगे गौरा देवी,श्रीमती घट्टी देवी,भादी देवी ,बाली देवी ,गौमती देवी ,हरकी देवी ,डुका  देवी ,मुसी देवी ,नवरती देवी ,उमा देवी ,बाटी देवी ,इंद्रा देवी, मालवती देवी , बिदुली देवी , रूपसी देवी ,चिल्याडी  देवी ,गौमा देवी ,फाल्गुनी देवी ,चंडी देवी ,जुठी देवी ,कुमारी मेघुली देवी ,रमौती देवी ,कलपती ,पारवती ,झोड़ी  और रुद्रा आशंका और आत्मविश्वास  से आगे बड़ रही थी। 



बाली देवी (बाएं)


         इन सबने खाना बना के  मजदूरों के समीप जाकर कहा , "भाईओं यह जंगल हमारा माइका है,यह वृक्ष हमारे ऋषि-मुनि हैं। " इनसे हमें जड़ी बूटियां ,सब्जी फल  और लकड़ी  मिलती हैं। जंगले  काटेंगे तो बाढ़ आएगी और हमारी जमीन बह जाएगी। खाना खा लो और फिर हमारे साथ वापस चलो , फैसला हो जायेगा। 




 ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे। उन्होंने काम में बाधा डालने पर गिरफ्तारी की धमकी दी,लेकिन महिलाएं नहीं डरी।  कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।,मगर उन सबके  भीतर छिपा रौद्र रूप  तब गौरा देवी के मार्फ़त प्रकट हुआ जब मज़दूर वृक्षों पर आ री और कुल्हाड़ियां चलने लगे। गौरा देवी ने सभी बहनो से कहा सब पेड़ों पर चिपक कर  रक्षा करें और कहा की आरी पेड़ों पर चलने से पहले हमारे शरीर पर चलेगी। 





      हम पेड़ों को नस्ट नहीं होने देंगे। जब एक ने बन्दूक निकाल कर बन्दूक का लक्ष्य उनकी और साधा  तो अपनी छाती तान कर गौरा देवी ने गरजते हुए उनसे कहा मारो गोली और काट दो हमारा मायका।


             मज़दूरों में भगदड़ मच गयी। ऋषि गंगा के तट पर एक नाले पर बनाया गया सीमेंट का पुल भी आक्रोश में  महिलाओं ने उखाड़ फेंका व् जंगल का रास्ता अवरुद्ध कर दिया गया ।ठेकेदार के आदमियों ने गौरा देवी को डरने-धमकाने का प्रयास किया। किन्तु गौरा देवी में विद्यमान माँ ने स्वयं पर नियंत्रण रखा। वह चुप रही। उसी स्थान पर सब महिलाएं बैठी रहीं ,अगली सुबह रीणी में गोविन्द सिंह रावत तथा चंडी प्रसाद भट्ट और हयात सिंह भी पहुंच गए।

                       
चंडी प्रसाद भट्ट (दाएँ ),गौरा देवी एवं हयात सिंह 

             जंगल बच गया।  गौरा देवी-प्रतिरोध की सौम्यता और गरिमा बानी रही। 27 मार्च और 31 मार्च को रीणी  में सभाएं हुई और बारी-बारी से जंगल की निगरानी आरम्भ हुई। उन्होंने मज़दूरों को समझाया-बुझाया।  3 और 5 अप्रैल को प्रदर्शन किया। 6 अप्रैल को पुनः प्रदर्शन किया।  इस कारण  पूरे तंत्र पर इतना भारी दबाव पड़ा कि डा. वीरेंद्र कुमार की अध्यक्षता में रीणी में जांच कमेटी बैठाई गई। सीमान्त का खामोश सा गाँव रीणी दुनिया का एक चर्चित गाँव हो गया गौरा देवी और अन्य महिलाएँ चिपको आंदोलन के प्रतीक बन गई। गौरा  देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने वृक्ष की जो रक्षा की वह घटना  विश्वभर में पर्यावरण चेतना के नवजागरण का सूत्रपात कर गई। उसके परिणाम स्वरुप सरकार ने ठेका प्रणाली समाप्त कर दी तथा उत्तरप्रदेश (अब उत्तराखंड ) वन निगम की स्थापना  की ,जो त्रुटिपूर्ण सरकारी नीति के विरुद्ध महिलाओं के अहिंसक आंदोलन की विजय थी। 

            गौरा देवी केवल रीणी तक ही सीमित नहीं रही ,बल्कि बदरीनाथ मंदिर की वास्तुकला के स्वरुप को जब बिड़ला  द्वारा नष्ट किया जाने लगा तो गौरा देवी आस-पास के गाँव की अन्य महिलाओं को लेकर बद्रीनाथ पहुंची,जहां उन्होंने बद्रीनाथ मंदिर बचाओ अभियान का नेतृत्व किया व् सभा की अध्यक्षता की।  गौरा देवी द्वारा अपनी जान की परवाह न करके जंगलों को काटने से बचा देना अत्यंत साहसिक कार्य था। उन्होंने पेड़ों की महिमा के बारे में वेद या ऋषि-मुनियोँ से तो नहीं सुनी,बल्कि अपने दैनिक जीवन सम्बन्ध से महसूस  की,इससे उनके जीवन में कई कर्म एवं भक्ति का अधभुत संगम था। यह दुर्भाग्य है की जब चिपको आंदोलन ने दुनिया का ध्यान अपनी और खींचा तो इसके दोनों नेताओं चण्डी प्रसाद भट्ट एवं सुन्दर लाल बहुगुणा को तो ख्याति मिली, उन्हें विभिन्न प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया ,लेकिन मातृशक्ति को संगठित करके चिपको आंदोलन को वास्तविक रूप में स्फूर्ति एवं प्रेरणा शक्ति प्रदान करने वाली गौरा देवी का नाम भुला दिया गया  और नेपथ्य में खोकर रह गए । ऐसी निष्काम कर्मयोगिनी को जो सम्मान दिया जाना चाहिए था ,उसमें भी कृपणता ही की गई है,लेकिन लोगो का ध्यान नहीं गया और जाता  भी कैसे? क्यों की प्रश्न श्रेय का  जो था। श्रेय लेने वालों की दौड़ लगी हुए थी ,लेकिन उस दौड़ में असली धावक नहीं था। कई वर्षो बाद वन मंत्रालय भारत सरकार ने गौरा देवी को वृक्ष मित्र की उपाधि से सम्मानित किया गया।
         4 जुलाई 1991 को गौरा देवी 66 वर्षा की उम्र में इस संसार से विदा हो गई। गौरा देवी के जीवन में हिमालय की धवलता एवं सेवा के लिए समर्पण की भावना के दर्शन होते हैं। गुजरा देवी व् उन अनेक महिलाओं को कोटि-कोटि नमन ,जिन्होंने रीणी चिपको आंदोलन में भाग लेकर कठोर संघर्ष से दबे थके हुए हिमालयवासियों का आत्मविश्वाश जगाया।