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Friday, December 22, 2017

कहानी भारत के अतिंम गाॅव मणिभद्रपुरी(माणा) की...

    भारत के सीमान्त का अंतिम ग्राम माना कभी मणिभद्रपुरी नाम से प्रसिद्ध था। इस गांव का नाम
भगवान शिव के भक्त मणिभद्र देव के नाम पर पड़ा है। कहा जाता है कि माणिकशाह नाम
एक व्यापारी था, जो शिव का बहुत बड़ा भक्त था। एक बार व्यापारिक से पैसे कमाकर 
लौटने के दौरान लुटेरों ने उसका सिर काट दिया। इसके बाद भी उसकी गर्दन शिव का
जाप कर रही थी।उसकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर शिव ने उसके गर्दन पर वराह का सिर लगा दिया।
कहते है कि इसके बाद माना गांव में मणिभद्र की पूजा की जाने लगी।

नीचे दिए गए विडिओ में भाग-1 और भाग-2  में आप इन स्थानों को देख सकते हैं. 
                          

        यहाँ उत्तराखंड में स्तिथ चमोली जिले की तहसील जोशीमठ से लगभग 48  किलोमीटर दूर अलकनंदा व् सरस्वती
नदी के संगम के किनारे श्रीबद्रीनाथ धाम से 3 किलोमीटर पर स्तिथ है।ग्राम माना भारत के अंतिम ग्राम होने के विषय
में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है ‘नंग मात नौ नी ,निति माना मात गौं नी ‘अर्थात हाथ के नाखून के आगे कोई नाम
नहीं और निति मन गाँव के आगे कोई गाँव नहीं। 
    इसी गाँव में ही तपस्या के पश्चात महर्षि वेदव्यास  जी ने  गणेश की सहायता से हिन्दुओ के धार्मिक ग्रन्थ महाभारत
की रचना की थी। उस स्थान को व्यास गुफा के नाम से जाना जाता है। व्यास गुफा जिस शिला के नीचे है उसे व्यास पोथी 
भी कहते है। पोथी का अर्थ होता है पुस्तक क्यों की अभी भी शिला का आकार पुस्तक के पन्नो की तरह प्रतीत होता है।
       निति गाँव धौली नदी के किनारे तहसील जोशीमठ से लगभग 80 किमी तथा मलारी ग्राम से 18 किमी आगे बसा है।
यह ग्राम के सीमान्त के अंतिम ग्राम है। धौली नदी एवं अलकनंदा का संगम विष्णुप्रयाग में होता है। इससे आगे
देवप्रयाग तक इस नदी का नाम अलकनन्दा ही रहता है। और जब भागीरथी नदी देवप्रयाग में अलकनंदा नदी साथ
मिल जाती है तब यह गंगा नाम से प्रसिद्ध हो जाती है। ग्राम माना के निकट दो नदियाँ अलकनंदा व् सरस्वती बहती हैं।
अलकनंदा नदी अलकापुरी बांक से तथा सरस्वती नदी तिब्बत मार्ग पर स्तिथ ह्युं तोली देवताल नामक बांक से निकलकर
केशव प्रयाग जो भारतवर्ष का अंतिम प्रयाग है,मिल जाती है। यहाँ से इस नदी का नाम अलकनंदा ही रहता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार  जब महर्षि वेदव्यास व् गणेश मणिभद्रपुरी में महाभारत ग्रन्थ की रचना कर रहे थे तो निकट
ही सरस्वती नदी बह रह थी। उसकी कल-कल ध्वनि के कारण लिखने में व्यवधान उत्पन हो रहा था। महृषि व्यास ने सरस्वती
नदी को शांत रहकर  बहने के लिए कहा ,किन्तु सरस्वती अपनी ही गति से बहने लगी ,जिसे महृषि ने श्राप दिया जिसके वजह
से ही कहा जाता है की सरस्वती का आधा पानी केशव प्रयाग में पाताल के मार्ग से प्रवेश कर पुनः सरस्वती त्रिवेणी प्रयागराज (इलाहबाद)
में प्रकट होती जाती है जहां गंगा,यमुना ,सरस्वती का संगम होता है।
                               



     ग्राम माणा के ठीक सामने बाएं ओर नर-नारायण  भगवान् की माता -माता मूर्ति  देवी है। यहां भाद्रपद माह में बावन द्वादशी
को माता मूर्ति का मेला लगता है। इस दिन उद्धवजी की मूर्ति को सुसज्जित कर पालकी में बैठाकर माता मूर्ति  देवी के मंदिर में ले
जाते हैं। श्री बद्रीनाथ जी के पुजारी रावलजी के द्वारा दोनों माता मूर्ति तथा उद्धव जी का भोग एक साथ लगाया  जाता है। इस मंदिर
से लगी हुए एक घास युक्त पहाड़ी है जिसे बुग्याल कहा जाता है जिसका नाम मैनाक  है। कहा जाता  है की ये बुग्याल का ये पहाड़
इन्द्र का ऐरावत हाथी है ,जिसका सिर दो नदियोँ अलकनंदा सरस्वती के बीच का पहाड़ मेंनडुंगरी है और सूंड केशव प्रयाग है। इसी 
मेंनडुंगरी पहाड़ पर भगवान् बदरीनाथ जी का श्याम कर्ण घोडा घास चरता हुआ प्रतीत होता है।
      सरस्वती नदी के किनारे लगभग 2 किमी आगे मुचकुन्द गुफा है। इसी गुफा में भगवान श्री कृष्णा ने कालयवन नामक राक्षस का
वध किया था। इस गुफा के अंदर भगवान् श्री कृष्ण के चरण चिन्ह हैं। इसी गुफा से लगा हुआ एक रमणीक मैदान है जिसे कलाप 
(कालपंग ) ग्राम कहा जाता है। कृष्णा जन्माष्टमी को यहां बहुत ही भव्य मेला का आयोजन होता है।
      इससे आगे छिपछिपा खर्क ,खुल्या गर्व्या होते हुए गमशाली निति के लिए बहुत ही कठिन मार्ग जाता है। ग्राम माणा के पूरब
की ओर लगभग 5 किमी दूर मोलपा बांक है जिसे कुबेर का भंडार भी कहते हैं। बांक बर्फ़ मिट्टी कंकड़ पत्थर से मिले जमे हुए पुराने
बर्फ़ को कहते हैं जो धीरे धीरे पिघलते हैं। इसी को galcier भी कहा जाता है।यह माना जाता है की जब बांक भरपूर हिम से भरा
रहता है तब यह के मूल निवासी मोलपा परिवार के लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है ।इसके विपरीत जब बांक बहुत अधिक
पिघल जाता है तो इन लोगों की आर्थिक स्तिथि भी बिगड़ती जाति है । मोलपा परिवार के नाम से ही इस कुबेर भंडार बांक का नाम
मोलपा बांक पड़ा होगा ।
       गाँव के मध्य में क्षेत्रपाल इष्टदेव श्री घंटाकरण का मंदिर है ।इस मंदिर के ठीक सामने दायीं ओर माता मूर्ति देवी का मंदिर है।
दोनो ही मंदिर के द्वार एक दूसरे से विपरीत बने हुए हैं ओर माना जाता है की ऐसा माता मूर्ति देवी एवं श्री घंटाकरण के बीच
कुछ अनबन के वजह से है ।घंटाकरण के मंदिर के आगन में यज्ञ कुंड है ।गाँव के निवासियों द्वारा प्रति 12 वर्ष में एक महायज्ञ
सम्पन्न कर इस कुंड को ढक दिया जाता है और पुनः 12 वर्ष के पश्चात ही महायज्ञ प्रारंभ होने पर ही कुंड को फिर से खोला जाता
है।
        गाँव के एक कोने पर विश्वकर्मा देवता का मंदिर है जो आदिकाल से देवताओं के मुख्य कारीगर यानी की एंजिनीयर माने
जाते हैं। गाँव के चारों ओर अन्य देवी देवताओं का भी मंदिर है जिनकी पूजा धार्मिक पर्वों व समय-समय पर होती रहती है। क्षेत्रपाल
श्री घंटाकरण की पूजा अनिवार्य रूप से चार परिवारों को प्रति वर्ष क्रम से करनी पड़ती है।ज्येठ संक्रांति से कार्तिक संक्रांति तक इन
चार लास्पा परिवारों को ही क्षेत्रपाल श्री घंटाकरण देवता की पूजा के साथ ही पंचायती कार्य भी निभाना पड़ता है।यह परम्परा आदि
काल से यहाँ पर चलता रहता है।
        ग्राम माणा से 5 किमी पश्चिम की ओर वसुधारा है,जहां अष्ट वसुओं ने तपस्या की थी। गाँव के निकट ही सरस्वती नदी पर
भीमपुल है। महाभारत के युद्ध में जब 18 अक्षोणी सेना मार चुकी थी,तब पाँचों पाण्डव द्रोपदी सहित इस पवित्र भूमि उत्तराखंड की
ओर स्वर्ग की कामना से जा रहे थे।सरस्वती नदी पर पुल ना होने के कारण भीम ने अपने बल व पराक्रम से एक बहुत विशाल
शिला यानी की पत्थर नदी के ऊपर रखकर पुल बना दिया जिसका प्रमाण नदी की बायीं ओर पहाड़ी पर विशाल पंजों के निशान
से मिलता है।

                            

                            
       वसुधारा से 1 किमी आगे अलकापुरी है यहीं से अलकनंदा नदी निकलती है।अलकापुरी के दाएँ ओर ठीक सामने लक्ष्मीवन
है जहां द्रोपदी ने अपना शरीर त्याग दिया। यहाँ से आगे दायीं ओर उत्तर गंगा तथा बाईं ओर सौ धारा,पनधारा(पाण्डव) धारा,
चक्रतीर्थ,सतोपंथ,स्वर्गारोहिणी,चौखम्बा हिमालय तथा चौखम्बा के पीछे श्री क़ेदारनाथ हैं। द्रोपदी के बाद क्रम से सहदेव,नकुल,
अर्जुन व भीम ने इन्ही मार्गों पर अपने शरीर त्याग दिए ओर अंत में केवल सत्यवादी महाराज युधिष्ठिर ही स्वशरीर बैकुण्ठ गए।
भीमपुल के निकट उर्गना नामक स्थान के दायीं ओर मान्या-फ़ान्या स्थान है।कहा जाता है की गाँव में जब किसी की मृत्यु
होती है तो दाहसंस्कार के पश्चात उसका अस्थि कलश व जन्मकुंडली कुछ समय के लिए इस स्थान पर रख दिनजाती है।
एक दो माह पश्चात किसी शुभ पर्व या पूर्णमासी,एकादशी को मृतक की अस्थि कलश व जन्मकुंडली लेकर स्वर्ग की कामना
कर्तेय हुए सतोपंथ की यात्रा कर्तेय हैं। इस यात्रा में सबसे पहले जमपाला(वैतरणी) नामक स्थान आता है जाह एक छोटा सा
पत्थर का पुल बना हुआ है। यहाँ तक मृतक के परिवार के सदस्य अन्य भई,बहन व रिश्तेदार आदि सभी मृतक की अस्थि कलश
जन्मकुंडली पहुँचाते हैं।इसी स्थान पर मृतक के लिए पहनने व ओढ़ने के वस्त्र तथा खाना पकाने के बर्तन आदि कुल पुरोहित
ब्राह्मण के माध्यम से शैय्या दाँ होता है। इसके पश्चात मृतक के पुत्र या भाई मृतक की अस्थि कलश व जन्मकुंडली को सिर पर
रखकर कुल पुरोहित के साथ सतोपंत पहुँचने पर त्रिकोनाकार सतोपंत तालाब में अंतिम विसर्जन किया जाता है। यह तालाब ग्राम
माणा से लगभग 20 किमी की दूरी पर है।
       माणा घाटी का फरण-फ़ाफ़र बहुत प्रसिध है। फरण एक बहुत छोटा सुघंदयुक्त फूल होता है , जिसे सुखाकर दाल या
सब्ज़ी को छौंकने में प्रयुक्त किया जाता है। फ़ाफ़र एक मोटा अनाज है,जिसका आटा जिसे बिट्टी भी कहते हैं,फलाहार के रूप
में प्रयोग होता है।कहा जाता है की बहुत समय पहले जब यातायात का कोई साधन नहीं था तब बद्रीनाथ धाम की यात्रा बहुत
कठिन थी,पैदल सड़क मार्ग भी अच्छी नहीं थी।उस समय यहाँ के लोगों द्वारा फ़ाफ़र के आटे बिट्टी का ही भगवान को भोग
लगाया जाता था। धीरे-धीरे यातायात की सुविधा होने के कारण यह परम्परा समाप्त हो गयी है।
     जब भी माह नोवेम्बर में भगवान बद्रीनाथ जी के कपाट 6 माह के लिए बंद होता है तो ग्राम माणा के लोगों द्वारा भगवान
बद्रीनाथ को शीतकाल के लिए एक ऊनी वस्त्र भेंट दी जाती है। इस वस्त्र को स्थानीय भाषा में वीनाकमल कहा जाता है जिसे
गाँव की चार-पाँच कन्याएँ जिनकी उम्र 10 से 15 वर्ष की होती है,बनाती हैं।इस ऊनी वस्त्र व फ़ाफ़र का आटा से भोग लगाने
के सम्बंध में आज भी एक कहावत है कि भगवान बद्रीनाथ जी के लिए सदियों से ही ‘ऊन की चोली व फ़ाफ़र की पोली’
माणा ग्राम की ओर से भेंट दी जाति है।
     इस क्षेत्र में पेड़ पौधे ना के समान है। कहीं कहीं बस भोजपत्र के पेड़ पाए जाते हैं। कहा जाता है कि प्राचीनकाल में यहाँ
‘व्याल वूती’ धान पैदा होता था जो शाम को बोए ओर सुबह को काटा जाता था जो अब किसी श्राप के कारण धान के पौध की
तरह के एक घास के रूप में जिसे चनणया कहते है,पाया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे नाफुति कहते हैं जो दूर से धान के पौधें
की तरह ही दिखता है। माणा ग्राम से 1 किमी दक्षिण पूर्व की ओर इंद्रधारा है,यहाँ इंद्रदेव ने तपस्या की थी,यहाँ से 1 किमी दूर
भृगु ग़ुफ़ा व धारा है जहां
महर्षि भृगु ने तपस्या की थी।
                          
      भृगु ग़ुफ़ा से लगभग 1 किमी दूर भगवान बद्रीनाथ जी का पवित्र मंदिर है,इस मंदिर के निकट ही ब्रह्मकपाल है,जहां ब्रह्मा
जी को ब्रह्महत्या से मुक्ति मिली थी।बद्रीनाथ मंदिर के सामने के दक्षिण की ओर से ऋषि गंगा बहती है।ऋषि गंगा की ओर चरण
पादुका तथा निकट हि वामणी ग्राम है,जहां नंदा देवी व उर्वशी का प्रसिध मंदिर है। पूरी बद्रीनाथ के ठीक सामने शेष नेत्र है।
ऋषि गंगा के उदग़म के आगे नीलकण्ठ हिमालय लग जाता है। श्री बद्रीनाथ जी से 1 किमी दक्षिण-पूर्व की ओर देवदर्शिनी व
कंचनगंगा है।
      इस प्रकार माणा ग्राम भारत के सुदूर सीमांत में बसा सदियों से प्रहरी के रूप में प्रकृति की सुरम्य शांत गोद में स्तिथ
पौराणिक महाभारत काल की पवित्र स्मृतियों से जुड़ा है,साथ ही उत्तराखंड के सर्वप्रमुख धाम बद्रीनाथ जी के निकट होने का
अपूर्ण गौरव इसे प्राप्त है।