देवः स पातु भुवनत्रिसूत्रधारस्वत्वं बालचंदकालिकॉडिकत जूटकोटिः।
एतत समग्रमपि करणमंत्रेण कात्सीन्यादिसूत्रयत येन विश्वम।।
द्वारा -समरांगणसूत्रधार ग्रंथ
----------राजा भोज ने शिव स्तुति करते हुए कहा है की ऐसा देव तुम्हारी रक्षा करे जिसकी जटाजूट में अर्धचंद्र शुशोभित है,जो तीनो लोको का सूत्रधार है। जिसके द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि की रचना बिना किसी कारन के की गयी है।
नीचे दिए गए विडिओ से मंदिर के भव्य दर्शन करें
भारत के मध्य में स्तिथ एक राज्य मध्यप्रदेश जिसकी राजधानी है भोपाल। भोपाल से ही मात्र ३० किमी की दूरी पर स्थित है भोजपुर मंदिर जिसका निर्माण परमार राजा भोज (1010-1055)द्वारा 11 शताब्दी में किया गया।
राजा भोज धारा के परमार शाशको के 9वे राजा थे जो एक दार्शनिक,कवि ,विद्वान एवं एक महान निर्माणकर्ता के रूप में प्रसिद्ध थे। उन्होंने परमार वंश की राजधानी उज्जैनी के स्थान पर धारानगरी को नवीन राजधानी बनाया। राजा भोज को स्थापत्य कला,ज्योतिष,व्याकरण,आदि पर लिखित ग्रंथो की रचना का श्रेय जाता है।

इस मंदिर के गर्भ-गृह में एक विशाल बेलनाकार शिवलिंग है जिसकी लम्बाई 6.3 मीटर है। इस शिवलिंग के चारो ओर दो भागो में तैयार विशाल योनपीठ पत्थरो को ऐसा पिरोया गया है जैसी ऊँगली में अंगूठी।

इसकी एक खास बात यह है की शिवलिंग की विशालता के कारण मंदिर के निर्माण होने से पूर्व ही शिवलिंग की स्थापना की गयी। इसे उत्तर के सोमनाथ के रूप में भी जाना जाता है।
दूसरी खास बात यह है की यह मंदिर बिना छत के है। इसलिए यह मंदिर एक प्रकार से अपूर्ण है जिसे स्वर्गारोहण प्रसाद का रूप दे दिया गया है।अथार्त इस मंदिर को मनुष्य शरीर के मरणोपरांत आत्मा के स्वर्ग के लिए प्रेषित होने के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। परन्तु अब अब मंदिर के इस छत को बाहरी मौसम एवं पशु-पक्षियों से शिवलिंग को क्षति ना पहुंचे, फाइबर ग्लास से ढक दिया गया है।
एक कहावत यह भी है की महाभारत काल के पाण्डु भीम ने माता कुंती की पूजा के लिए शिवलिंग एवं मंदिर एक रात में तैयार किया जो सुभह होने तक अधूरा रह गया।
मंदिर बनाने का स्थान के चुनाव के बाद मंदिर के विभिन्न भागो के डिज़ाइन को पत्थरों पर रेखाओं द्वारा उकेरा गया जो केवल शिव मंदिर के भाग के लिए ही नहीं बल्कि विभिन्न दुसरे मंदिरो के निर्माण से भी संबध थे जिनका निर्माण अधूरा रह गया। यह अधूरापन मंदिर के आसपास पड़े हुए विभिन्न पथरों से बनी मूर्तियों एवं मंदिरो के भागो के शिलाखंडों के टुकड़े से पता चलता है।
गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर दोनों तरफ से रक्षक के रूप में शिव प्रतिहार,गणो,भारवाहक तथा शुद्धता का प्रतीक नदी देवियों के मूर्तियों को लगाया गया है। मंदिर के बाहरी दीवारों को लीला मूर्तियों से सुसज्जित किया गया है।
गर्भगृह के पिलर पर शिव-पार्वती,लक्ष्मी-नारायण,राम-जानकी एवं ब्रह्म-शक्ति के युगल देवीय प्रतिमाओं को लगाया गया है।
मंदिर के पूर्वी दिशा में एक विशाल रपटा(रैंप) का निर्माण किया गे है जो कंकड़,पत्थर एवं मिट्टी से निर्मित है।यही रपटा मंदिर के विशाल शिलाखंडों को उचित स्थान पर ले जाने के लिए किया गया है।

मंदिर के पास ही एक भव्य संग्राहलय है जो मंदिर से जुडी हर कहानियों को संजोये हुए है।
एतत समग्रमपि करणमंत्रेण कात्सीन्यादिसूत्रयत येन विश्वम।।
द्वारा -समरांगणसूत्रधार ग्रंथ
----------राजा भोज ने शिव स्तुति करते हुए कहा है की ऐसा देव तुम्हारी रक्षा करे जिसकी जटाजूट में अर्धचंद्र शुशोभित है,जो तीनो लोको का सूत्रधार है। जिसके द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि की रचना बिना किसी कारन के की गयी है।
भारत के मध्य में स्तिथ एक राज्य मध्यप्रदेश जिसकी राजधानी है भोपाल। भोपाल से ही मात्र ३० किमी की दूरी पर स्थित है भोजपुर मंदिर जिसका निर्माण परमार राजा भोज (1010-1055)द्वारा 11 शताब्दी में किया गया।
राजा भोज धारा के परमार शाशको के 9वे राजा थे जो एक दार्शनिक,कवि ,विद्वान एवं एक महान निर्माणकर्ता के रूप में प्रसिद्ध थे। उन्होंने परमार वंश की राजधानी उज्जैनी के स्थान पर धारानगरी को नवीन राजधानी बनाया। राजा भोज को स्थापत्य कला,ज्योतिष,व्याकरण,आदि पर लिखित ग्रंथो की रचना का श्रेय जाता है।
इस मंदिर के गर्भ-गृह में एक विशाल बेलनाकार शिवलिंग है जिसकी लम्बाई 6.3 मीटर है। इस शिवलिंग के चारो ओर दो भागो में तैयार विशाल योनपीठ पत्थरो को ऐसा पिरोया गया है जैसी ऊँगली में अंगूठी।
इसकी एक खास बात यह है की शिवलिंग की विशालता के कारण मंदिर के निर्माण होने से पूर्व ही शिवलिंग की स्थापना की गयी। इसे उत्तर के सोमनाथ के रूप में भी जाना जाता है।
दूसरी खास बात यह है की यह मंदिर बिना छत के है। इसलिए यह मंदिर एक प्रकार से अपूर्ण है जिसे स्वर्गारोहण प्रसाद का रूप दे दिया गया है।अथार्त इस मंदिर को मनुष्य शरीर के मरणोपरांत आत्मा के स्वर्ग के लिए प्रेषित होने के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। परन्तु अब अब मंदिर के इस छत को बाहरी मौसम एवं पशु-पक्षियों से शिवलिंग को क्षति ना पहुंचे, फाइबर ग्लास से ढक दिया गया है।
एक कहावत यह भी है की महाभारत काल के पाण्डु भीम ने माता कुंती की पूजा के लिए शिवलिंग एवं मंदिर एक रात में तैयार किया जो सुभह होने तक अधूरा रह गया।
मंदिर बनाने का स्थान के चुनाव के बाद मंदिर के विभिन्न भागो के डिज़ाइन को पत्थरों पर रेखाओं द्वारा उकेरा गया जो केवल शिव मंदिर के भाग के लिए ही नहीं बल्कि विभिन्न दुसरे मंदिरो के निर्माण से भी संबध थे जिनका निर्माण अधूरा रह गया। यह अधूरापन मंदिर के आसपास पड़े हुए विभिन्न पथरों से बनी मूर्तियों एवं मंदिरो के भागो के शिलाखंडों के टुकड़े से पता चलता है।
गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर दोनों तरफ से रक्षक के रूप में शिव प्रतिहार,गणो,भारवाहक तथा शुद्धता का प्रतीक नदी देवियों के मूर्तियों को लगाया गया है। मंदिर के बाहरी दीवारों को लीला मूर्तियों से सुसज्जित किया गया है।
गर्भगृह के पिलर पर शिव-पार्वती,लक्ष्मी-नारायण,राम-जानकी एवं ब्रह्म-शक्ति के युगल देवीय प्रतिमाओं को लगाया गया है।
मंदिर के पूर्वी दिशा में एक विशाल रपटा(रैंप) का निर्माण किया गे है जो कंकड़,पत्थर एवं मिट्टी से निर्मित है।यही रपटा मंदिर के विशाल शिलाखंडों को उचित स्थान पर ले जाने के लिए किया गया है।
मंदिर के पास ही एक भव्य संग्राहलय है जो मंदिर से जुडी हर कहानियों को संजोये हुए है।

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