उत्तराखंड के पंच केदार में दो केदार है गोपीनाथ मंदिर एवं तुंगनाथ मंदिर।गोपीनाथ मंदिर जिला के गोपेश्वर ब्लॉक एवं तुंगनाथ मंदिर चोपता ब्लॉक में स्तिथ हैं।
कहा जाता है की स्वर्गरोहणी के पांचो पांडव यहाँ से होते हुए निकले तो उन्होंने ही ये दो मंदिर जो भगवा न शिवजी को समर्पित है, यहाँ बनवाए।
गोपीनाथ एक खासियत यह है की दुसरे मंदिरो की तरह यह पर भगवान शिवजी को पानी और दूत नहीं चढ़ाया जाता है। इसके बजाय शिवलिंग पर बेलपत्री के पत्ते चढ़ाये जाते हैं।
दूरी यह कथा प्रचलित है की किसी बहुत पुराने समय में एक गाय यहाँ पर रोज शिवलिंग पर दूध चढ़ाने आये करती थी जिसे देखकर कत्यूरी वंश के राजा अति अचंभित और प्रसन्न हुए और उन्होंने हीं इस मंदिर का निर्माण कराया।
मंदिर के चारो तरफ कुछ टूटी फूटी मूर्तियों के अवशेस हैं जो इस बात की और इशारा करती हैं की यह मंदिर पौराणिक काल से यहाँ पर स्तिथ है। मंदिर के बाहरी प्रांगण में बहुत सारे शिवलिंग एवं एक कल्पवृक्ष है। मंदिर के दीवारों पर भगवन श्री नारायण एवं श्री कालभैरव जी के कलाकृतियां बानी हुई हैं। मंदिर में भगवान् श्री विष्णु , भगवान् श्री गणेश , भगवान हनुमान ,भगवान् ब्रह्मा ,माता काली ,श्री गरुड़ देव एवं सरस्वती माता जी की मूर्तियां हैं।
मंदिर अपनी खूबसूरत नक्काशी,गुंबद व् गर्भ-गृह के कारण भी काफी प्रसिद्ध है। इसके गर्भ-गृह में 25 द्वार हैं।गर्भ-गृह के अंदर ही स्वम्भू शिवलिंग श्री गोपीनाथ जी व् शिवजी के वाहन नंदी जी हैं।


मंदिर के प्रवेश द्वार के दाहिने तरफ के प्रांगण में शिवजी का लगभग 5 मीटर का त्रिशूल है जो आठ भिन्न धातुओं(अष्टधातु ) से मिश्रित है।
यह बहुत आश्चर्य चकित की बात है की यह त्रिशूल वातावरण या मौसम के प्रभाव से अभी तक अछूता रहा है जब की यह 12 विं शताब्दी से भी पुराना है।
यह भी सत्य है की अगर कोई स्वच्छ ह्रदय वाला मनुष्य इस त्रिशूल को अगर एक अंगुली से भी हिलाये तो यह त्रिशूल बहुत जोर से हिलता है,जबकि कपटी मनुष्य अगर दोनों हाथों से भी इस त्रिशूल को हिलाये तो भी यह टस से मस नहीं होता है।
इस त्रिशूल का यहाँ पर प्रकट होने के पीछे भी एक रोचक कथा है। इस कथा के अनुसार जब काम देवता शिवजी के तपस्या भंग करने के लिये उनके सामने प्रस्तुत हुए तो शिवजी ने क्रोधवश कामदेव जी पर अपने त्रिशूल से प्रहार किया और कामदेवजी भस्म हो गए । कहा जाता है के ये वही त्रिशूल है। और इसके बाद कामदेवजी की पत्नी रति ने अपने पति को पुनर्जीवित करने के लिए घोर तपस्या की जिससे शिवजी प्रसन्न हुए और कामदेवजी को पुनर्जीवित करने का वरदान दिया।दूसरी कथा यह प्रचलित है की जब शिवजी क्षत्रियों के विध्वंश करने में लगे हुए थे तब भगवान् शिवजी को शांत करने के लिए परशुराम के त्रिशूल को तीन भागो में विभाजित किया गया जिसका एक भाग गोपीनाथ मंदिर में गिरा।
इसके अलावा गोपेश्वर से लगभग 13 से 15 KM की दूरी पर चोपता स्तिथ है जो अपनी खूबसूरत बुग्याल एवं चारो तरफ मंत्रमुग्ध करने वाला प्राकर्तिक छठा भखेरे हुए है। यह जगह इतनी खूबसूरत है की मैं मिनी स्विट्ज़रलैंड कहना भी इसकी तौहीन होगा क्यों की यह है मेरा असली भारत का एक खूबसूरत हिस्सा जिसका कोई सनी नहीं। यह स्थान उत्तराखंड के केदारनाथ वन्यजीव संस्थान वाले हिस्से में स्थित है।यह जगह सदाबहार हरे वनो व् पहाड़ो से घिरा हुआ है।यहाँ के जांगले देवदार व् चीड़ के पेड़ो से भरे पड़े हैं। इसके आलावा यह पर पक्षियों व् हिरणो की अति दुर्लभ प्रजातियां पायी जाती हैं। इसके आसपास के इलाको में प्रसिद्ध पांच केदार के तीसरे केदार तुंगनाथ जी का मंदिर जो की लगभग 4 KM की दूरी पर और तुंगनाथ से लगभग 2 KM की दूरी पर चंद्रशिला स्थल है।इसके अलावा यह पर बहुप्रसिद्ध ताल देवरिया ताल भी है।
चोपता हिमालय की गोद में बसा एक रमणीय स्थल है जहाँ से त्रशूल पर्वत,चौखम्बा पर्वत और नंदा देवी पर्वत के मनोरम दृश्य देकने को मिलते हैं।
चोपता भारत की राजधानी दिल्ली से लगभग 430 KM की दूरी पर स्तिथ है।
इस जगह को एक बार अवश्य महसूस करना चाहिए क्यों की अगर आपने चोपता नहीं देखा तो क्या देखा।








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